व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस ्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्ध भूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्त विक्षेपास्तेSन्तरायाह !! योग दर्शन- समाधिपाद , सूत्र !! ३० !!
व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आल्लास्य, अविरति, भ्रान्ति दर्शन, अलब्ध भूमिकत्व और अनवस्थितत्व ये नौ, चित्त के विक्षेप हैं, वे ही अंतराय अर्थात विघ्नरूप हैं !
योगपथ पर चल रहे साधक को जो विघ्न पथभ्रष्ट करते हैं, वे यही नौ प्रकार के विघ्न हैं !
१. व्याधि: - शरीर में किसिस प्रकार का रोग, इन्द्रियों में कमजोरी आ जाना तथा चित्त में भ्रम, उद्विग्नता आदि आ जाना व्याधि कहलाती है!
२. स्त्यान: - कार्य करने में असमर्थ होने, अकर्मण्यता, कार्य में अनुत्साह, अथवा सामर्थ्य की कमी को 'स्त्यान ' कहते हैं !
३. संशय: - योग विद्या की वस्तुस्थिति पर विश्वास ना होने तथा अपने प्रयत्न की सफलता पर आशंका करना 'संशय' कहलाता है !
४. प्रमाद:- लापरवाही पूर्वक योग साधना करना, नियमित क्रम को अधुरा छोड़ देना और वह बिगड़ भी जाये, तो भी उसकी चिंता ना करना 'प्रमाद' कहलाता है !
५. आलस्य: - तमोगुण के रहने पर शरीर का भारी रहना, कार्य में मन ना लग्न, सुस्ती बनी रहना ही 'आलस्य' कहलाता है !
६. अविरति :- विषयासक्ति होने से मन का विषयों में ही लगे रहना तथा चित्त में वैराग्य का आभाव हो जाना 'अविरति' कहलाता है !
७. भ्रान्ति दर्शन :- किसी कारणवश अध्यात्म के दर्शन और साधन पथ का वास्तविक ज्ञान ना हो पाना अथवा यह साधन उपयुक्त नहीं है , ऐसा भ्रामक ज्ञान 'भ्रान्ति दर्शन' नमक विघ्न कहलाता है !
८. अलब्ध भूमिकत्व :- निरंतर साधना करने पर भी साधक की स्थिति में ना पहुँच पाना तथा मध्य में ही मन के वेग का अवरुद्ध हो जाना 'अलब्ध भूमिकत्व' कहलाता है !
९. अनवस्थितत्व :- चित्त का एकाग्र अथवा स्थिर ना रह पाना , जिससे भूमिका तक ना पहुँच पाना और अस्थिरता के फलस्वरूप मनोभूमि का डाँवाडोल बने रहना 'अनवस्थितत्व' कहलाता है !
इसके अलावा कुछ और प्रकार के भी विघ्न होते हैं, जिसका वर्णन महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन के समाधिपाद के ३१वें सूत्र में किया है !
व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आल्लास्य, अविरति, भ्रान्ति दर्शन, अलब्ध भूमिकत्व और अनवस्थितत्व ये नौ, चित्त के विक्षेप हैं, वे ही अंतराय अर्थात विघ्नरूप हैं !
योगपथ पर चल रहे साधक को जो विघ्न पथभ्रष्ट करते हैं, वे यही नौ प्रकार के विघ्न हैं !
१. व्याधि: - शरीर में किसिस प्रकार का रोग, इन्द्रियों में कमजोरी आ जाना तथा चित्त में भ्रम, उद्विग्नता आदि आ जाना व्याधि कहलाती है!
२. स्त्यान: - कार्य करने में असमर्थ होने, अकर्मण्यता, कार्य में अनुत्साह, अथवा सामर्थ्य की कमी को 'स्त्यान ' कहते हैं !
३. संशय: - योग विद्या की वस्तुस्थिति पर विश्वास ना होने तथा अपने प्रयत्न की सफलता पर आशंका करना 'संशय' कहलाता है !
४. प्रमाद:- लापरवाही पूर्वक योग साधना करना, नियमित क्रम को अधुरा छोड़ देना और वह बिगड़ भी जाये, तो भी उसकी चिंता ना करना 'प्रमाद' कहलाता है !
५. आलस्य: - तमोगुण के रहने पर शरीर का भारी रहना, कार्य में मन ना लग्न, सुस्ती बनी रहना ही 'आलस्य' कहलाता है !
६. अविरति :- विषयासक्ति होने से मन का विषयों में ही लगे रहना तथा चित्त में वैराग्य का आभाव हो जाना 'अविरति' कहलाता है !
७. भ्रान्ति दर्शन :- किसी कारणवश अध्यात्म के दर्शन और साधन पथ का वास्तविक ज्ञान ना हो पाना अथवा यह साधन उपयुक्त नहीं है , ऐसा भ्रामक ज्ञान 'भ्रान्ति दर्शन' नमक विघ्न कहलाता है !
८. अलब्ध भूमिकत्व :- निरंतर साधना करने पर भी साधक की स्थिति में ना पहुँच पाना तथा मध्य में ही मन के वेग का अवरुद्ध हो जाना 'अलब्ध भूमिकत्व' कहलाता है !
९. अनवस्थितत्व :- चित्त का एकाग्र अथवा स्थिर ना रह पाना , जिससे भूमिका तक ना पहुँच पाना और अस्थिरता के फलस्वरूप मनोभूमि का डाँवाडोल बने रहना 'अनवस्थितत्व' कहलाता है !
इसके अलावा कुछ और प्रकार के भी विघ्न होते हैं, जिसका वर्णन महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन के समाधिपाद के ३१वें सूत्र में किया है !
Comments
Post a Comment