ईश्वर के नाम का जप करो


जैसे पानी की बूँद को बाष्प बनाने से उसमें 1300 गुनी ताकत आ जाती है वैसे ही मंत्र को जितनी गहराई से जपा जाता है, उसका प्रभाव उतना ही ज्यादा होता है |


गहराई से जप करने से मन की एकाग्रता बढ़ती है |


एकाग्रता सभी सफलताओं की जननी है |


मंत्रजाप निष्काम भाव से प्रीतिपूर्वक किया जाना चाहिए |






भाव से प्रेमपूर्वक विधिसहित जप करने वाला साधक बहुत शीघ्र अच्छा लाभ उठा सकता है |


ईश्वर के नाम का बार-बार जप करो |


को फुरसत के समय में प्रभु का नाम रटने की आदत डालें |


को सदैव कुछ-न-कुछ चाहिए |


चित्त खाली रहेगा तो संकल्प-विकल्प करके उपद्रव पैदा करेगा |


इसलिए पूरा दिन व रात्रि को बार-बार हरिस्मरण करें |


चित्त या तो हरि-स्मरण करेगा या फिर विषयों का चिंतन करेगा


इसलिए जप का ऐसा अभ्यास डाल लें कि मन परवश होकर नींद में या जाग्रत में बेकार पड़े कि तुरंत जप करने लगे |


इससे मन का इधर-उधर भागना कम होगा |


मन को परमात्मा के सिवाय फिर अन्य विषयों में चैन नहीं मिलेगा I






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चमत्कार


चमत्कार- इस जगत में चमत्कार जैसी चीज होती नहीं,............. हो नहीं सकती।


इस जगत में जो कुछ होता है, नियम से होता है।


हाँ, यह हो सकता है, उस नियम का हमें पता न हो।


यह हो सकता है कि उस कार्य का कारण का हमें बोध न हो।


यह हो सकता है कि कोई लिंक, कोई कड़ी अज्ञात हो, जो हमारी पकड़ में नहीं आती, इसीलिए बाद की कड़ियों को समझना बहुत मुश्किल हो जाता है।






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आरती क्यों और कैसे?






पूजा के बाद हम सभी भगवान की आरती करते हैं।


आरती के दौरान कई विभिन्न सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है।


इन सबका विशेष अर्थ होता है।


ऐसी मान्यता है कि न केवल आरती करने, बल्कि इसमें शामिल होने पर भी बहुत पुण्य मिलता है।


किसी भी देवता की आरती करते समय उन्हें ३ बार पुष्प अर्पित करें।


इस दरम्यान ढोल, नगाडे, घडियाल आदि भी बजाना चाहिए।


एक शुभ पात्र में शुद्ध घी लें और उसमें विषम संख्या [जैसे 3,5या 7]में बत्तियां जलाकर आरती करें।


आप चाहें, तो कपूर से भी आरती कर सकते हैं।


सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है, जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं।


आरती पांच प्रकार से की जाती है।


पहली दीपमाला से,


दूसरी जल से भरे शंख से,


तीसरा धुले हुए वस्त्र से


, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से


और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग [मस्तिष्क, दोनों हाथ-पांव] से।


पंच-प्राणों की प्रतीक आरती हमारे शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक है।


आरती करते हुए भक्त का भाव ऐसा होना चाहिए, मानो वह पंच-प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो।


घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है।


यदि हम अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारतीकहलाती है।


सामग्री का महत्व आरती के दौरान हम न केवल कलश का प्रयोग करते हैं, बल्कि उसमें कई प्रकार की सामग्रियां भी डालते जाते हैं।


इन सभी के पीछे न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक आधार भी हैं।


कलश-कलश एक खास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल खाली होता है। कहते हैं कि इस खाली स्थान में शिव बसते हैं।


यदि आप आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप शिव से एकाकार हो रहे हैं। किंवदंतिहै कि समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था।


इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है।


जल-जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। दरअसल, हम जल को शुद्ध तत्व मानते हैं, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं।


नारियल- आरती के समय हम कलश पर नारियल रखते हैं।


नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है।


हम जब आरती गाते हैं, तो नारियल की शिखाओं में मौजूद ऊर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है।


यह तरंगें काफी सूक्ष्म होती हैं।


सोना- ऐसी मान्यता है कि सोना अपने आस-पास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है।


सोने को शुद्ध कहा जाता है।


यही वजह है कि सोना भक्तों को भगवान से जोडने का माध्यम भी माना जाता है।


तांबे का पैसा- तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है।


कलश में उठती हुई लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं।


कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक भी माना जाता है।


यदि आप कलश में तांबे के पैसे डालते हैं, तो इसका मतलब है कि आपमें सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।


सप्तनदियोंका जल-गंगा, गोदावरी,यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरीऔर नर्मदा नदी का जल पूजा के कलश में डाला जाता है।


सप्त नदियों के जल में सकारात्मक ऊर्जा को आकृष्ट करने और उसे वातावरण में प्रवाहित करने की क्षमता होती है।


ज्यादातर योगी-मुनि ने ईश्वर से एकाकार करने के लिए इन्हीं नदियों के किनारे तपस्या की थी।


सुपारी और पान- यदि हम जल में सुपारी डालते हैं, तो इससे उत्पन्न तरंगें हमारे रजोगुण को समाप्त कर देते हैं और हमारे भीतर देवता के अच्छे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ जाती है।


पान की बेल को नागबेलभी कहते हैं।


नागबेलको भूलोक और ब्रह्मलोक को जोडने वाली कडी माना जाता है।


इसमें भूमि तरंगों को आकृष्ट करने की क्षमता होती है।


साथ ही, इसे सात्विक भी कहा गया है।


देवता की मूर्ति से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पान के डंठल द्वारा ग्रहण की जाती है।


तुलसी-आयुर्र्वेद में तुलसी का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है।


अन्य वनस्पतियों की तुलना में तुलसी में वातावरण को शुद्ध करने की क्षमता अधिक होती है।


-[मीता जिंदल]






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शिष्य का निर्माण गुरु द्वारा ही हो सकता है


शिष्य की रक्षा करना भी गुरु का ही धरम है


शिष्यों के दोष भी गुरु द्वारा संहारे जा सकते हैं


अत शिष्य को भी गुरु के आदेश का पालन करते हुए


निस्वार्थ भाव से प्रभु की भक्ति करनी चाहिए






वास्तु आचार्य


० ९०१३ २० ३० ४०






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मानो या न मानो


घात तिथि >वार >नक्शातर > लगन > चंदर्मा >


इन सबको यात्रा ओर सभी शुभ कार्यों में वर्जित समझें


वास्तु आचार्य


० 9013203040






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अमावस


रिक्त तिथि 4/9/14


जनम नक्शातर


ओर


क्रूर व़ार


रवि शनि मंगल ओर


गंडांत नक्शातर


विवाह में वर्जित होते हैं






वास्तु आचार्य


० 9013203040






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मॉस के अंत में


तिथि के अंत में


नक्षतेर के अंत में


कन्या दान न करें


VAASTU आचार्य


० 9013203040






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जनम राशि :


सभी शुभ कार्य विवाह यात्रा ग्रेह निर्माण partishtha और गोचर ग्रेह देखने में जनम राशि ही परधान होगी ।






वास्तु आचार्य


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चारो वेदों का मानना है की ब्रह्मण के आशीर्वाद से शत्रु का नाश होता है


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वास्तु आचार्य


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स्वर संतान प्राप्ति के लिए ऋषियों ने अनुकूल बताया है।


सर्प दोष के कारन अगर संतान प्राप्ति असंभव लगती हो तो उचित विधान द्वारा नाग शांति या पित्तर दोष शांति अवश्य करवा लेनी चाहिए


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ओशो






सेक्स का दमन ना करें: ओशो









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'हमने सेक्स को सिवाय गाली के आज तक दूसरा कोई सम्मान नहीं दिया। हम तो बात करने में भयभीत होते हैं। हमने तो सेक्स को इस भांति छिपा कर रख दिया है जैसे वह है ही नहीं, जैसे उसका जीवन में कोई स्थान नहीं है। जब कि सच्चाई यह है कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण मनुष्य के जीवन में और कुछ भी नहीं है। लेकिन उसको छिपाया है, उसको दबाया है। दबाने और छिपाने से मनुष्य सेक्स से मुक्त नहीं हो गया, बल्कि मनुष्य और भी बुरी तरह से सेक्स से ग्रसित हो गया। दमन उलटे परिणाम लाया है...।'






सेक्स को समझों : युवकों से मैं कहना चाहता हूँ कि तुम्हारे माँ-बाप तुम्हारे पुरखे, तुम्हारी हजारों साल की पीढ़ियाँ सेक्स से भयभीत रही हैं। तुम भयभीत मत रहना। तुम समझने की कोशिश करना उसे। तुम पहचानने की कोशिश करना। तुम बात करना। तुम सेक्स के संबंध में आधुनिक जो नई खोजें हुई हैं उसको पढ़ना, चर्चा करना और समझने की कोशिश करना कि क्या है सेक्स?






सेक्स का विरोध ना करें : सेक्स थकान लाता है। इसीलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि इसकी अवहेलना मत करो, जब तक तुम इसके पागलपन को नहीं जान लेते, तुम इससे छुटकारा नहीं पा सकते। जब तक तुम इसकी व्यर्थता को नहीं पहचान लेते तब तक बदलाव असंभव है।






मैं बिलकुल भी सेक्स विरोधी नहीं हूँ। क्योंकि जो लोग सेक्स का विरोध करेंगे वे काम वासना में फँसे रहेंगे। मैं सेक्स के पक्ष में हूँ क्योंकि यदि तुम सेक्स में गहरे चले गए तो तुम शीघ्र ही इससे मुक्त हो सकते हो। जितनी सजगता से तुम सेक्स में उतरोगे उतनी ही शीघ्रता से तुम इससे मुक्ति भी पा जाओगे। और वह दिन भाग्यशाली होगा जिस दिन तुम सेक्स से पूरी तरह मुक्त हो जाओगे।






धन और सेक्स : धन में शक्ति है, इसलिए धन का प्रयोग कई तरह से किया जा सकता है। धन से सेक्स खरीदा जा सकता है और सदियों से यह होता आ रहा है। राजाओं के पास हजारों पत्नियाँ हुआ करती थीं। बीसवीं सदी में ही केवल तीस-चालीस साल पहले हैदराबाद के निजाम की पाँच सौ पत्नियाँ थीं।






मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जिसके पास तीन सौ पैंसठ कारें थीं और एक कार तो सोने की थी। धन में शक्ति है क्योंकि धन से कुछ भी खरीदा जा सकता है। धन और सेक्स में अवश्य संबंध है।






एक बात और समझने जैसी है, जो सेक्स का दमन करता है वह अपनी ऊर्जा धन कमाने में खर्च करने लग जाता है क्योंकि धन सेक्स की जगह ले लेता है। धन ही उसका प्रेम बन जाता है, धन के लोभी को गौर से देखना- सौ रुपए के नोट को ऐसे छूता है जैसे उसकी प्रेमिका हो और जब सोने की तरफ देखता है तो उसकी आँखें कितनी रोमांटिक हो जाती हैं... बड़े-बड़े कवि भी उसके सामने फीके पड़ जाते हैं। धन ही उसकी प्रेमिका होती है। वह धन की पूजा करता है, धन यानी देवी। भारत में धन की पूजा होती है, दीवाली के दिन थाली में रुपए रखकर पूजते हैं। बुद्धिमान लोग भी यह मूर्खता करते देखे गए हैं।






दुख और सेक्स : जहाँ से हमारे सुख दु:खों में रूपांतरित होते हैं, वह सीमा रेखा है जहाँ नीचे दु:ख है, ऊपर सुख है इसलिए दु:खी आदमी सेक्सुअली हो जाता है। बहुत सुखी आदमी नॉन-सेक्सुअल हो जाता है क्योंकि उसके लिए एक ही सुख है। जैसे दरिद्र समाज है, दीन समाज है, दु:खी समाज है, तो वह एकदम बच्चे पैदा करेगा। गरीब आदमी जितने बच्चे पैदा करता है, अमीर आदमी नहीं करता। अमीर आदमी को अकसर बच्चे गोद लेने पड़ते हैं!






उसका कारण है। गरीब आदमी एकदम बच्चे पैदा करता है। उसके पास एक ही सुख है, बाकी सब दु:ख ही ‍दु:ख हैं। इस दु:ख से बचने के लिए एक ही मौका है उसके पास कि वह सेक्स में चला जाए। वह ही उसके लिए एकमात्र सुख का अनुभव है, जो उसे हो सकता है। वह वही है।






सेक्स से बचने का सूत्र : जब भी तुम्हारे मन में कामवासना उठे तो उसमें उतरो। धीरे- धीरे तुम्हारी राह साफ हो जाएगी। जब भी तुम्हें लगे कि कामवासना तुम्हें पकड़ रही है, तब डरो मत शांत होकर बैठ जाओ। जोर से श्वास को बाहर फेंको- उच्छवास। भीतर मत लो श्वास को क्योंकि जैसे ही तुम भीतर गहरी श्वास को लोगे, भीतर जाती श्वास काम-ऊर्जा को नीचे की तरफ धकाती है।






जब तुम्हें कामवासना पकड़े, तब बाहर फेंको श्वास को। नाभि को भीतर खींचो, पेट को भीतर लो और श्वास को फेंको...जितनी फेंक सको फेंको। धीरे-धीरे अभ्यास होने पर तुम संपूर्ण रूप से श्वास को बाहर फेंकने में सफल हो जाओगे।






सेक्स और प्रेम : वास्तविक प्रेमी अंत तक प्रेम करते हैं। अंतिम दिन वे इतनी गहराई से प्रेम करते हैं जितना उन्होंने प्रथम दिन किया होता है; उनका प्रेम कोई उत्तेजना नहीं होता। उत्तेजना तो वासना होती है। तुम सदैव ज्वरग्रस्त नहीं रह सकते। तुम्हें स्थिर और सामान्य होना होता है। वास्तविक प्रेम किसी बुखार की तरह नहीं होता यह तो श्वास जैसा है जो निरंतर चलता रहता है।






प्रेम ही हो जाओ। जब आलिंगन में हो तो आलिंगन हो जाओ, चुंबन हो जाओ। अपने को इस पूरी तरह भूल जाओ कि तुम कह सको कि मैं अब नहीं हूँ, केवल प्रेम है। तब हृदय नहीं धड़कता है, प्रेम ही धड़कता है। तब खून नहीं दौड़ता है, प्रेम ही दौड़ता है। तब आँखें नहीं देखती हैं, प्रेम ही देखता है। तब हाथ छूने को नहीं बढ़ते, प्रेम ही छूने को बढ़ता है। प्रेम बन जाओ और शाश्वत जीवन में प्रवेश करो।






साभार : पथ के प्रदीप, धम्मपद : दि वे ऑफ दि बुद्धा, ओशो उपनिषद, तंत्र सूत्र, रिटर्निंग टु दि सोर्स, एब्सोल्यूट ताओ से संकलित अंश।






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जब तुम प्रेम करते हो, तो नफरत भी कर सकते हो। जो व्यक्ति नपुंसक है और प्रेम नहीं कर सकता, वह हमेशा नकारात्मक पर ही जोर देगा। वह हमेशा नकारात्मक को ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश करेगा। वह हमेशा तुमसे कहेगा- ..


अगर तुम प्रेम में पड़े तो दुख उठाओगे। तुम जाल में फँस जाओगे, तुम्हें तकलीफें भोगनी होंगी। और,


स्वाभाविक रूप से जब भी घृणा के क्षण आएँगे और तुम दुख का सामना करोगे तो तुम्हें वह व्यक्ति याद आएगा कि वह सही कहता था।






फिर, घृणा के क्षण तो आने ही हैं। फिर एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि मनुष्य रोगों के प्रति ज्यादा सचेत होता है न कि स्वास्थ्य के प्रति। जब स्वस्थ होते हो तो तुम अपने शरीर के बारे में भूल जाते हो। लेकिन, जैसे ही सिर दर्द होता है या और कोई दर्द, या फिर पेट का दर्द तो देह को नहीं भूल पाते। देह होती है तब, प्रमुखता से होती है, बड़े जोर से होती है, वह तुम्हारा दरवाजा खटखटाती है। वह तुम्हारा ध्यान खींचती है।


osho






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शुभ समय का प्रतीक है मुहूर्त


सात 'स' से कीजिए हर काम













कहते हैं किसी भी वस्तु या कार्य को प्रारंभ करने में मुहूर्त देखा जाता है, जिससे मन को बड़ा सुकून मिलता है। हम कोई भी बंगला या भवन निर्मित करें या कोई व्यवसाय करने हेतु कोई सुंदर और भव्य इमारत बनाएं तो सर्वप्रथम हमें 'मुहूर्त' को प्राथमिकता देनी होगी।






शुभ तिथि, वार, माह व नक्षत्रों में कोई इमारत बनाना प्रारंभ करने से न केवल किसी भी परिवार को आर्थिक, सामाजिक, मानसिक व शारीरिक फायदे मिलते हैं वरन उस परिवार के सदस्यों में सुख-शांति व स्वास्थ्य की प्राप्ति भी होती है।






यहां शुभ वार, शुभ महीना, शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र भवन निर्मित करते समय इस प्रकार से देखे जाने चाहिए ताकि निर्विघ्न, कोई भी कार्य संपादित हो सके।






शुभ वार : सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार (गुरुवार), शुक्रवार तथा शनिचर (शनिवार) सर्वाधिक शुभ दिन माने गए हैं। मंगलवार एवं रविवार को कभी भी भूमिपूजन, गृह निर्माण की शुरुआत, शिलान्यास या गृह प्रवेश नहीं करना चाहिए।






शुभ माह : देशी या भारतीय पद्धति के अनुसार फाल्गुन, वैशाख एवं श्रावण महीना गृह निर्माण हेतु भूमिपूजन तथा शिलान्यास के लिए सर्वश्रेष्ठ महीने हैं, जबकि माघ, ज्येष्ठ, भाद्रपद एवं मार्गशीर्ष महीने मध्यम श्रेणी के हैं। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि चैत्र, आषाढ़, आश्विन तथा कार्तिक मास में उपरोक्त शुभ कार्य की शुरुआत कदापि न करें। इन महीनों में गृह निर्माण प्रारंभ करने से धन, पशु एवं परिवार के सदस्यों की आयु पर असर गिरता है।






शुभ तिथि : गृह निर्माण हेतु सर्वाधिक शुभ तिथियां ये हैं : द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी एवं त्रयोदशी तिथियां, ये तिथियां सबसे ज्यादा प्रशस्त तथा प्रचलित बताई गई हैं, जबकि अष्टमी तिथि मध्यम मानी गई है।













प्रत्येक महीने में तीनों रिक्ता अशुभ होती हैं। ये रिक्ता तिथियां निम्न हैं- चतुर्थी, नवमी एवं चौदस या चतुर्दशी। रिक्ता से आशय रिक्त से है, जिसे बोलचाल की भाषा में खालीपन या सूनापन लिए हुए रिक्त (खाली) तिथियां कहते हैं। अतः इन उक्त तीनों तिथियों में गृह निर्माणनिषेध है।






शुभ नक्षत्र : किसी भी शुभ महीने के रोहिणी, पुष्य, अश्लेषा, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपदा, स्वाति, हस्तचित्रा, रेवती, शतभिषा, धनिष्ठा सर्वाधिक उत्तम एवं पवित्र नक्षत्र हैं। गृह निर्माण या कोई भी शुभ कार्य इन नक्षत्रों में करना हितकर है। बाकी सभी नक्षत्र सामान्य नक्षत्रों की श्रेणी में आ जाते हैं।






सात 'स' और शुभता


शास्त्रानुसार (स) अथवा (श) वर्ण से शुरू होने वाले सात शुभ लक्षणों में गृहारंभ निर्मित करने से धन-धान्य व अपूर्व सुख-वैभव की निरंतर वृद्धि होती है व पारिवारिक सदस्यों का बौद्धिक, मानसिक व सामाजिक विकास होता है। सप्त साकार का यह योग है, स्वाति नक्षत्र, शनिवार का दिन, शुक्ल पक्ष, सप्तमी तिथि, शुभ योग, सिंह लग्न एवं श्रावण माह।










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शुभ कार्यों में रखें विशेष सावधानी





भारतीय संस्कृति में पंचांग, मुहूर्त का बहुत महत्व है। जो हमें किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले बहुत सारी सावधानियां बरतने की सलाह भी देता है।


मुहूर्त के अंतर्गत कुछ विशेष प्रकार की सावधानियों का जिक्र किया गया है। जो निम्नानुसार है।






- रिक्ता तिथियों यानी चतुर्थी, नवमी एवं चतुदर्शी के दिन रोजगार संबंधी कोई भी नया काम नहीं शुरू करना चाहिए।






- शुभ एवं मांगलिक कार्य अमावस्या तिथि में शुरू नहीं करना चाहिए।






- रविवार, मंगलवार एवं शनिवार के दिन समझौता एवं संधि नहीं करनी चाहिए। दिन, तिथि व नक्षत्र का योग जिस दिन 13 आए उस दिन उत्सव का आयोजन नहीं करना चाहिए।






- नन्दा तिथियों एवं प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी तिथि के दिन नवीन योजना पर कार्य शुरू नहीं करना चाहिए।










- देवशयन काल में बच्चों को स्कूल में दाखिला नहीं दिलाना चाहिए।






- बुधवार के दिन उधार देना व मंगलवार को उधर लेना मुहूर्त की दृष्टि से शुभ नहीं माना गया है।






- नए वाहन खरीदते समय ध्यान रखना चाहिए कि आपकी राशि से चंद्रमा घात राशि पर मौजूद नहीं हो।






- कोई ग्रह जब उदय या अस्त हो तो उसके तीन दिन पहले और बाद में नया काम नहीं करना चाहिए।






- जन्म राशि और जन्म नक्षत्र का स्वामी जब अस्त, वक्री अथवा शत्रु ग्रहों के बीच हों तब आय एवं जीवन से जु़ड़े विषय को विस्तार नहीं देना चाहिए।






- मुहूर्त में क्षय तिथि का भी त्याग करना चाहिए।






- असफलता से बचने के लिए जन्म राशि से चौथी, आठवीं और बारहवीं राशि पर जब चंद्र हो उस समय नया काम शुरू नहीं करना चाहिए।






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व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्त विक्षेपास्तेSन्तरायाह !! योग दर्शन- समाधिपाद , सूत्र !! ३० !!






व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आल्लास्य, अविरति, भ्रान्ति दर्शन, अलब्ध भूमिकत्व और अनवस्थितत्व ये नौ, चित्त के विक्षेप हैं, वे ही अंतराय अर्थात विघ्नरूप हैं !


योगपथ पर चल रहे साधक को जो विघ्न पथभ्रष्ट करते हैं, वे यही नौ प्रकार के विघ्न हैं !






१. व्याधि: - शरीर में किसिस प्रकार का रोग, इन्द्रियों में कमजोरी आ जाना तथा चित्त में भ्रम, उद्विग्नता आदि आ जाना व्याधि कहलाती है!


२. स्त्यान: - कार्य करने में असमर्थ होने, अकर्मण्यता, कार्य में अनुत्साह, अथवा सामर्थ्य की कमी को 'स्त्यान ' कहते हैं !


३. संशय: - योग विद्या की वस्तुस्थिति पर विश्वास ना होने तथा अपने प्रयत्न की सफलता पर आशंका करना 'संशय' कहलाता है !


४. प्रमाद:- लापरवाही पूर्वक योग साधना करना, नियमित क्रम को अधुरा छोड़ देना और वह बिगड़ भी जाये, तो भी उसकी चिंता ना करना 'प्रमाद' कहलाता है !


५. आलस्य: - तमोगुण के रहने पर शरीर का भारी रहना, कार्य में मन ना लग्न, सुस्ती बनी रहना ही 'आलस्य' कहलाता है !


६. अविरति :- विषयासक्ति होने से मन का विषयों में ही लगे रहना तथा चित्त में वैराग्य का आभाव हो जाना 'अविरति' कहलाता है !


७. भ्रान्ति दर्शन :- किसी कारणवश अध्यात्म के दर्शन और साधन पथ का वास्तविक ज्ञान ना हो पाना अथवा यह साधन उपयुक्त नहीं है , ऐसा भ्रामक ज्ञान 'भ्रान्ति दर्शन' नमक विघ्न कहलाता है !


८. अलब्ध भूमिकत्व :- निरंतर साधना करने पर भी साधक की स्थिति में ना पहुँच पाना तथा मध्य में ही मन के वेग का अवरुद्ध हो जाना 'अलब्ध भूमिकत्व' कहलाता है !


९. अनवस्थितत्व :- चित्त का एकाग्र अथवा स्थिर ना रह पाना , जिससे भूमिका तक ना पहुँच पाना और अस्थिरता के फलस्वरूप मनोभूमि का डाँवाडोल बने रहना 'अनवस्थितत्व' कहलाता है !


इसके अलावा कुछ और प्रकार के भी विघ्न होते हैं, जिसका वर्णन महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन के समाधिपाद के ३१वें सूत्र में किया है !






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Faith on astrologers:






"Yadrishi bhavana yasya siddhir bhavati tadrishi”






The scriptures say that the type of results one attains depends on the thoughts/faith one has while approaching the Daivagya(astrologer),


teerath sthal(pilgrim),


devta(God),


vaidya(doctor),


mantra and aushadi(medicine).






So one must approach for astrological consultation only if he/she has complete faith in astrology, rituals, remedies and the astrologer










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You can drop me a mail with the following details:










1) Name


2) Contact Number


3) Introduction


4) Horoscope details: Date, Time and Place of birth.


5) Problem statement


6) Isht Devta (favorite god/goddess)






Email:astropujacentre@gmail.com


Fees : Rs 500/Horoscope


It would take me around 1-2 weeks to revert back to you with the astrological solutions to your problems.






Please note:






1) Astrological Consultation is not available free of cost because it involves considerable time, effort and analysis. Moreover paying dakshina to guru, vaidya, priest and jyotishi is a must.






2) For queries related to married life and child-birth the horoscopes of both the husband & wife have to be analyzed.






3) Prior knowledge of astrology or horoscopes does not entitle you for a free service or to debate/discuss all the astrological rules learnt by you till date.






4) The client should not expect an astrologer to inform him about his each and every second, hour and day, as an astrologer can only provide the necessary guidance as per the planetary placements and does not have the capacity to behave like God.










5) The client should ask any doubts/concerns related to the remedies suggested within 3 days of my replying to the email. Fees once paid will not entitle you for a lifelong discussion.










Faith on astrologers:






"Yadrishi bhavana yasya siddhir bhavati tadrishi”






The scriptures say that the type of results one attains depends on the thoughts/faith one has while approaching the Daivagya(astrologer), teerath sthal(pilgrim), devta(God), vaidya(doctor), mantra and aushadi(medicine).






So one must approach for astrological consultation only if he/she has complete faith in astrology, rituals, remedies and the astrologer






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'विचार योग' से पाएं सेहत, खुशी और सफलता
















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अजीब है कि कोई दवा नहीं, एक्सरसाइज नहीं और कोई भी इलाज नहीं फिर भी लोग सोचकर कैसे ठीक हो सकते हैं? दुनिया में ऐसे बहुत से चमत्कार हुए हैं, लेकिन इसके पीछे के रहस्य को कोई नहीं जानता।






आज आप जो भी हैं वह आपके पिछले विचारों का परिणाम है-भगवान बुद्ध। सोचे अपनी सोच पर कि वह कितनी नकारात्म और कितनी सकारात्मक है, वह कितनी सही और कितनी गलत है। आप कितना अपने और दूसरों के बारे में अच्‍छा और बुरा सोचते रहते हैं। योग आपकी सोच को स्वस्थ बनाता है। सोच के स्वस्थ बनने से चित्त निर्मल होने लगता है। चित्त के निर्मल रहने से सेहत, खुशी और सफलता मिलती है तो विचार करें अच्छे विचार पर।






कैसे होगा यह संभव : योगश्चित्त्वृतिनिरोध:- योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है। योग के आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि सभी उपक्रम आपके चित्त को शुद्ध और बुद्ध बनाने के ही उपक्रम हैं। चित्त से ही व्यक्ति का शरीर, मन, मस्तिष्क और जीवन संचालित होता है। चित्त यदि रोग ग्रस्त है तो इसका असर सभी पर पड़ता है। रोग की उत्पत्ति बाहर की अपेक्षा भीतर से कहीं ज्यादा होती है तो समझे कि जैसे भीतर वैसा बाहर।






वैज्ञानिक कहते हैं मानव मस्तिष्क में 24 घंटे में लगभग हजारों विचार आते हैं। उनमें से ज्यादातर नकारात्मक होते हैं। नकारात्मक विचार इसलिए अधिक होते हैं कि जब हम कोई नकारात्मक घटना देखते हैं जिसमें भय, राग, द्वैष, सेक्स आदि हो तो वह घटना या विचार हमारे चित्त की इनर मेमोरी में सीधा चला जाता है जबकि कोई अच्छी बातें हमारे चित्त की आउटर मेमोरी में ही घुम फिरकर दम तोड़ देती है।






दो तरह की मेमोरी होती है-इनर और आउटर। इनर मेमोरी में वह डाटा सेव हो जाता है, जिसका आपके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़श है और फिर फिर वह डाटा कभी नहीं मिटता। रात को सोते समय इनर मेमोरी सक्रिय रहती है और सुबह-सुबह उठते वक्त भी इनर मेमोरी जागी हुई होती है। अपनी इनर मेमोरी अर्थात चित्त से व्यर्थ और नकारात्मक डाटा को हटाओ और सेहत, सफलता, खुशी और शांति की ओर एक-एक कदम बढ़ाओ।






कैसे बन जाता है व्यक्ति दुखी और रोगी : जो भी विचार निरंतर आ रहा है वह धारणा का रूप धर लेता है। अर्थात वह हमारी इनर मेमोरी में चला जाता है। आपके आसपास बुरे घटनाक्रम घटे हैं और आप उसको बार-बार याद करते हैं तो वह याद धारणा बनकर चित्त में स्थाई रूप ले लेगी। बुरे विचार या घटनाक्रम को बार-बार याद न करें।






विचार ही वस्तु बन जाते हैं। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि हम जैसा सोचते हैं वैसे ही भविष्य का निर्माण करते हैं। यदि आपको अपनी सेहत को लेकर भय है, सफलता को लेकर संदेह है और आप विश्वास खो चुके हैं तो समझ जाएं की चित्त रोगी हो गया है। किसी व्यक्ति के जीवन में बुरे घटनाक्रम बार-बार सामने आ जाते हैं तो इसका सीधा सा कारण है वह अपने अतीत के बारे में हद से ज्यादा विचार कर रहा है। बहुत से लोग डरे रहते हैं इस बात से कि कहीं मुझे भी वह रोग न हो जाए या कहीं मेरे साथ भी ऐसा न हो जाए....आदि। सोचे सिर्फ वर्तमान को सुधारने के बारे में।






कैसे होगा यह संभव : योग के तीन अंग ईश्वर प्राणिधान, स्वाध्याय और धारणा से होगा यह संभव। जैसा ‍कि हमने उपर लिखा की इनर और आउटर मेमोरी होती है। इनर मेमोरी रात को सोते वक्त और सुबह उठते वक्त सक्रिय रही है उस वक्त वह दिनभर के घटनाक्रम, विचार आदि से महत्वपूर्ण डाडा को सेव करती है। इसीलिए सभी धर्म ने उस वक्त को ईश्वर प्रार्थना के लिऋ नियु‍क्त किया है ताकि तुम वह सोचकर सो जाए और वही सोचकर उठो जो शुभ है। इसीलिए योग में 'ईश्वर प्राणिधान' का महत्व है।






संधिकाल अर्थात जब सूर्य उदय होने वाला होता है और जब सूर्य अस्त हो जाता है तो उक्त दो वक्त को संधिकाल कहते हैं- ऐसी दिन और रात में मिलाकर कुल आठ संधिकाल होते हैं। उस वक्त हिंदू धर्म और योग में प्रार्थना या संध्यावंन का महत्व बताया गया है। फिर भी प्रात: और शाम की संधि सभी के लिए महत्वपूर्ण है जबकि हमारी इनर मेमोरी सक्रिय रहती है। ऐसे वक्त जबकि पक्षी अपने घर को लौट रहे होते हैं...संध्यावंदन करते हुए अच्छे विचारों पर सोचना चाहिए। जैसे की मैं सेहतमंद बना रहना चाहता हूं।









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ईश्वर प्राणिधान: सिर्फ एक ही ईश्वर है जिसे ब्रह्म या परमेश्वर कहा गया है। इसके अलावा और कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। ईश्वर निराकार है यही अद्वैत सत्य है। ईश्वर प्राणिधान का अर्थ है, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण। ईश्वर के प्रति पूर्ण विश्वास। न देवी, न देवता, न पीर और न ही गुरु घंटाल।






एक ही ईश्वर के प्रति अडिग रहने वाले के मन में दृढ़ता आती है। यह दृढ़ता ही उसकी जीत का कारण है। चाहे सुख हो या घोर दुःख, उसके प्रति अपनी आस्था को डिगाएँ नहीं। इससे आपके भीतर पाँचों इंद्रियों में एकजुटता आएगी और लक्ष्य को भेदने की ताकत बढ़ेगी। वे लोग जो अपनी आस्था बदलते रहते हैं, भीतर से कमजोर होते जाते हैं।






विश्वास रखें सिर्फ 'ईश्वर' में, इससे बिखरी हुई सोच को एक नई दिशा मिलेगी। और जब आपकी सोच सिर्फ एक ही दिशा में बहने लगेगी तो वह धारणा का रूप धर लेगी और फिर आप सोचे अपने बारे में सिर्फ अच्‍छा और सिर्फ अच्छा। ईश्वर आपकी मनोकामना अवश्य पूरी करेगा।






स्वाध्याय : स्वाध्याय का अर्थ है स्वयं का अध्ययन करना। अच्छे विचारों का अध्ययन करना और इस अध्ययन का अभ्यास करना। आप स्वयं के ज्ञान, कर्म और व्यवहार की समीक्षा करते हुए पढ़ें, वह सब कुछ जिससे आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता हो साथ ही आपको इससे खुशी ‍भी मिलती हो। तो बेहतर किताबों को अपना मित्र बनाएँ।






जीवन को नई दिशा देने की शुरुआत आप छोटे-छोटे संकल्प से कर सकते हैं। संकल्प लें कि आज से मैं बदल दूँगा वह सब कुछ जिसे बदलने के लिए मैं न जाने कब से सोच रहा हूँ। अच्छा सोचना और महसूस करना स्वाध्याय की पहली शर्त है।






धारणा से पाएं मनचाही सेहत, खुशी और सफलता : जो विचार धीरे-धीरे जाने-अनजाने दृढ़ होने लगते हैं वह धारणा का रूप धर लेते हैं। यह भी कि श्वास-प्रश्वास के मंद व शांत होने पर, इंद्रियों के विषयों से हटने पर, मन अपने आप स्थिर होकर शरीर के अंतर्गत किसी स्थान विशेष में स्थिर हो जाता है तो ऊर्जा का बहाव भी एक ही दिशा में होता है। ऐसे चित्त की शक्ति बढ़ जाती है, फिर वह जो भी सोचता है वह घटित होने लगता है। जो लोग दृढ़ निश्चयी होते हैं, अनजाने में ही उनकी भी धारणा पुष्ट होने लगती है।


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ऋण मुक्ति से ही समृद्धि संभव


दिवाली पूजन का महत्व













लक्ष्मीवान होने के लिए ऋणों से मुक्ति प्रथम सीढ़ी है। शास्त्रानुसार व्यक्ति यदि अपने मूल कर्ज से निवृत्ति का उपाय नहीं करता है, तो उसे इस जीवन में अर्थ, उपकार, दया के रूप में किसी भी तरह का उधार लेना ही पड़ता है। इस उधार को उतारने के पश्चात ही मनुष्य लक्ष्मी को प्राप्त कर सकता है।






लेकिन पांच ऋण- देव ऋण, पितृ ऋण, ऋषि ऋण, भूत-ऋण एवं मनुष्य ऋण में से किसी भी ऋण का उपाय नहीं किया जाए तो धनवान होने की संभावना निर्मूल है। यदि अध्ययन-अध्यापन करें तो ब्रह्मयज्ञ होने से ऋषि ऋण से मुक्ति मिलती है। हवन-पूजन करने से देवयज्ञ होने पर देव ऋण पूर्ण होता है। श्राद्ध-तर्पण-पूर्वजों के निमित्त दानादि कर्म से पितृ ऋण उतर जाता है। बलिवैश्व देव एवं पंचबलि करने से भूत ऋण चुक जाता है। अतिथि सत्कार-मानव सेवा से मनुष्य ऋण समाप्त होता है।






इन कर्जों से निवृत्ति मिलने पर हमें भौतिक कर्ज की आवश्यकता नहीं होती है। इस कर्म के पूर्ण होने पर गृहस्थ के यहाँ लक्ष्मी निवास करती है। 'या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः।' इस शास्त्र वाक्य से घर में समृद्धि का स्वयं निवास रहता है। लक्ष्मी से व्यक्ति सुरक्षित, सुसंपन्न, आश्रय देने वाला होकर इस जीवन को सुगमता से पार कर लेता है। अतः दरिद्रता-ऋण से मुक्ति के लिए पुण्यों का संचय करना आवश्यक है।













पुण्यों के संग्रह किसी भी काल में हो सकते हैं। लेकिन पर्व में इसका विशेष महत्व है तथा इन पर्वों में भी दीप का यह पर्व वर्ष का श्रेष्ठतम पर्व है। दीप पर्व कार्तिक मास में जो लक्ष्मीपति का माह है, आने से इसका सर्वोच्च स्थान है। कार्तिक माह के पुष्य नक्षत्र, धन त्रयोदशी, रूप चौदस, महालक्ष्मी पूजन, अन्नाकूट, भाईदूज, सूर्य षष्ठी, अक्षय नवमी, देव प्रबोधनी एकादशी, वैकुंठ चतुर्दशी प्रमुख हैं। इन सबमें पर्वराज दीपावली है। कार्तिक मास में आने वाले इन शुभ दिनों में हम ऐसे कुछ अनुभूत प्रयोगों की चर्चा करेंगे जिससे व्यक्ति सामर्थ्यवान होकर अपनी कामनाओं की पूर्ति करने में सक्षम होगा।






रूप चतुर्दशी के दिन पवित्रता से पांच प्रकार के पुष्पों की माला में दूर्वा व बिल्वपत्र लगाकर देवी को अर्पित करें। माल्यार्पण करते समय मौन रखें। यह प्रयोग प्रभावकारी होकर यश की वृद्धि करता है।













दीपावली की रात्रि में ग्यारह बजे के बाद एकाग्रता से बैठकर नेत्र बंद करके ऐसा ध्यान करें कि सामने महालक्ष्मी कमलासन पर विराजमान हों और आप उनके ऊपर कमल पुष्प चढ़ा रहे हैं। ऐसे कुल 108 मानसिक कमल पुष्प अर्पित करें। ऐसा करने से लक्ष्मी की कृपा होती है। साथ में विष्णु सहस्रनाम या गोपाल सहस्रनाम का पाठ करें तो अति उत्तम है।






अन्नकूट के दिन भोजन बनाकर देवता के निमित्त मंदिर में, पितरों के निमित्त गाय को, क्षेत्रपाल के निमित्त कुत्ते को, ऋषियों के निमित्त ब्राह्मण को, कुलदेव के निमित्त पक्षी को, भूतादि के निमित्त भिखारी को दें। साथ में वृक्ष को जल अर्पित करें, सूर्य को अर्घ्य दें, अग्नि में घी अर्पित करें, चींटियों को आटा तथा मछली को आटे की गोली देने से घर में बरकत आती है।






भाईदूज के दिन प्रातः शुद्ध पवित्र होकर रेशमी धागा गुरु व ईष्ट देव का स्मरण करके धूप दीप के बाद उनके दाहिने हाथ में यह डोरा बांधें। डोरा बांधते समय ईश्वर का स्मरण करते रहें। यह प्रयोग वर्षपर्यंत सुरक्षा देता है। सूर्य षष्ठी के दिन सायंकाल तांबे के लोटे में कुमकुम, केसर, लाल फूल डालकर सूर्य की ओर मुंह करके जल दें। जल देकर वहीं सात बार घूमें। यह तेज प्रदायक प्रयोग है। अक्षय नवमी के दिन इक्कीस आंवले, एक नारियल देवता के सामने रखकर श्रद्धा-भक्ति से प्रणाम करना चाहिए। चढ़े हुए आंवले व नारियल के साथ कपड़ा व मुद्रा रखकर बहन व ब्राह्मण को दे दें। यह दान आपके पुण्यों को अक्षय प्रदान करता है।






देव प्रबोधनी एकादशी को छोटी दिवाली भी कहा जाता है। देवता के जागने के इस दिन से शुभ काम की शुरुआत होती है। संस्कारादि कार्यों की प्रारंभता के लिए श्रेष्ठ दिन में आप सिंदूर व गाय के घी या शुद्ध घी मिलाकर अनार की लकड़ी से निम्न यंत्र घर में किसी भी पवित्र स्थान पर पूर्व या उत्तर की दीवार पर लिखें। यदि दीवार पर स्थान नहीं मिलें तो किसी चोकोर अखंडित पत्थर पर भी यह यंत्र बना सकते हैं।






विशेष परिस्थिति में बिना लाइन वाले सफेद कागज पर भी बनाकर पूर्व या उत्तर की ओर रख सकते हैं। इस यंत्र को लिखकर उस पर पुष्प, अक्षत, धूप, दीप व नेवैद्य से पूजना चाहिए। फिर उसके सामने 108 बार 'ॐ दू दुर्गायैः नमः' मंत्र का जप करना चाहिए, ऐसा करने से घर में समृद्धि आती है।






सभी प्रकार की बाधा का शमन होता है। यंत्र में अंक हिन्दी वर्णमाला के लिखें। यंत्र बाएं से दाएं ओर की तथा नीचे से ऊपर करके लिखें।






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