गंडमूल नक्षत्र का जीवन पर ब्यापक प्रभाव - कौशल पाण्डेय जी
गंडमूल नक्षत्रों जैसे अश्विनी, मघा, मूल, आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती को गंडमूल नक्षत्र कहा जाता है।
गंडमूल नक्षत्र की शांति नक्षत्र के आने पर 27 दिन बाद की जानी चाहिए।
मूल, ज्येष्ठा व आश्लेषा ये तीन गंड कारक होते हैं।
अश्विनी, रेवती और मघा ये तीन अपगंड नक्षत्र होते हैं।
मूल, ज्येष्ठा व आश्लेषा की अंतिम चार घड़ी (1.36 मिनट) गंड कहलाती
और ज्येष्ठा का बुरा प्रभाव दिन में, आश्लेषा और मघा का बुरा प्रभाव रात्रि में, अश्विनी और रेवती का बुरा प्रभाव सायं काल में होता है। अश्विनी का प्रथम चरण, मघा के पहले दो चरण व रेवती का अंतिम चरण अनिष्ट कारक होता है। गंडमूल नक्षत्रों का जातक पर क्या प्रभाव होता है?
अश्विनी नक्षत्र में पैदा हुए जातक सुंदर, सौभाग्ययुक्त, चालाक, स्त्री प्रिय, शूरवीर, बुद्धिमान, दृढ़निश्चयी, जल्दबाज, निरोग, राजपक्ष से लाभ कमाने वाले और संघर्षमय जीवन व्यतीत करते हैं।
अश्विनी प्रथम चरण : पिता के लिए कष्टकारक। दूसरा चरण : अधिक पैसा खर्च करने वाले। तीसरा चरण : घूमने वाला (भ्रमणशील) चौथा चरण : अपने शरीर के लिए कष्टकारी
आश्लेषा नक्षत्र : कर्क राशि व बुध के नक्षत्र में पैदा हुये जातक शीघ्र ही बदल जाने वाले, धनवान, कलाकार, चतुर बुद्धि, लोगों के काम करने में तत्पर, खाने-पीने के शौकीन व हंसमुख होते हैं। अगर यह नक्षत्र पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो जातक धूर्त, क्रूर कार्य करने वाला, परस्त्रीगामी, व्यसनी, स्वार्थी तथा शीघ्र क्रुद्ध हो जाता है।
आश्लेषा प्रथम चरण : विशेष दोष नहीं। दूसरा चरण : पैतृक धन हानि तीसरा चरण : माता या सास के लिए अरिष्ट कारक चतुर्थ चरण : पिता को कष्टकारी
मघा नक्षत्र : सूर्य की राशि सिंह एवं केतु के नक्षत्र में पैदा हुये जातक स्पष्टवादी, मुंहफट, जल्दी गुस्सा करने वाले व हठी प्रकृति के होते हैं। कठोर मन वाला और स्त्री पक्ष से द्वेष रखने वाला होता है।
मघा प्रथम चरण : माता या मातृ पक्ष को हानि। दूसरा चरण : पिता को अरिष्ट तीसरा चरण : शुभ फलदायक चौथा चरण : विद्या और धन के लिए शुभ होता है।
ज्येष्ठा नक्षत्र : मंगल की राशि (वृश्चिक) बुध के इस नक्षत्र में पैदा हुये जातक क्रोधी, सरल हृदय, अध्ययनशील, स्पष्टवादी, तर्कशील, वाकयुद्ध में प्रवीण, धार्मिक, सहयोगी व अहंकारी होते हैं।
ज्येष्ठा प्रथम चरण : बड़े भाई को अरिष्ट दूसरा चरण : छोटे भाई को अरिष्ट तीसरा चरण : माता या नानी को अरिष्ट चौथा चरण : जातक स्वयं को अनिष्टकारी
मूल नक्षत्र : केतु के नक्षत्र और गुरु की राशि धनु में पैदा जातक धार्मिक, उदार हृदय, धनी, ईमानदार, मिलनसार, परोपकारी, नीतिवान, सामाजिक कार्यों में व्यस्त और अच्छे संस्कारों से युक्त होते हैं। सामान्यतया समस्त मूल नक्षत्र को अरिष्ट कारक माना गया है। मूल नक्षत्र में पैदा हुये जातक का शुरू एवं अंत की घड़ियों में विद्वान आचार्यों में मतांतर पाया जाता है।
मूल प्रथम चरण - पिता का नाश दूसरा चरण - माता का नाश तीसरा चरण - धन का नाश चौथा चरण - जातक सुखी, धनी मूल नक्षत्र के संबंध में अनेक मत प्रचलित हैं।
गंडमूल नक्षत्र की शांति कैसे करे -
वापस उसी नक्षत्र के आने पर 27 दिन बाद की जानी चाहिए या जब भी गंडमूल नक्षत्र अश्विनी ,अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा ,मूला, रेवती हो उसी दिन इसकी शांति करानी चाहिए.
गंडमूल नक्षत्रों जैसे अश्विनी, मघा, मूल, आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती को गंडमूल नक्षत्र कहा जाता है।
गंडमूल नक्षत्र की शांति नक्षत्र के आने पर 27 दिन बाद की जानी चाहिए।
मूल, ज्येष्ठा व आश्लेषा ये तीन गंड कारक होते हैं।
अश्विनी, रेवती और मघा ये तीन अपगंड नक्षत्र होते हैं।
मूल, ज्येष्ठा व आश्लेषा की अंतिम चार घड़ी (1.36 मिनट) गंड कहलाती
और ज्येष्ठा का बुरा प्रभाव दिन में, आश्लेषा और मघा का बुरा प्रभाव रात्रि में, अश्विनी और रेवती का बुरा प्रभाव सायं काल में होता है। अश्विनी का प्रथम चरण, मघा के पहले दो चरण व रेवती का अंतिम चरण अनिष्ट कारक होता है। गंडमूल नक्षत्रों का जातक पर क्या प्रभाव होता है?
अश्विनी नक्षत्र में पैदा हुए जातक सुंदर, सौभाग्ययुक्त, चालाक, स्त्री प्रिय, शूरवीर, बुद्धिमान, दृढ़निश्चयी, जल्दबाज, निरोग, राजपक्ष से लाभ कमाने वाले और संघर्षमय जीवन व्यतीत करते हैं।
अश्विनी प्रथम चरण : पिता के लिए कष्टकारक। दूसरा चरण : अधिक पैसा खर्च करने वाले। तीसरा चरण : घूमने वाला (भ्रमणशील) चौथा चरण : अपने शरीर के लिए कष्टकारी
आश्लेषा नक्षत्र : कर्क राशि व बुध के नक्षत्र में पैदा हुये जातक शीघ्र ही बदल जाने वाले, धनवान, कलाकार, चतुर बुद्धि, लोगों के काम करने में तत्पर, खाने-पीने के शौकीन व हंसमुख होते हैं। अगर यह नक्षत्र पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो जातक धूर्त, क्रूर कार्य करने वाला, परस्त्रीगामी, व्यसनी, स्वार्थी तथा शीघ्र क्रुद्ध हो जाता है।
आश्लेषा प्रथम चरण : विशेष दोष नहीं। दूसरा चरण : पैतृक धन हानि तीसरा चरण : माता या सास के लिए अरिष्ट कारक चतुर्थ चरण : पिता को कष्टकारी
मघा नक्षत्र : सूर्य की राशि सिंह एवं केतु के नक्षत्र में पैदा हुये जातक स्पष्टवादी, मुंहफट, जल्दी गुस्सा करने वाले व हठी प्रकृति के होते हैं। कठोर मन वाला और स्त्री पक्ष से द्वेष रखने वाला होता है।
मघा प्रथम चरण : माता या मातृ पक्ष को हानि। दूसरा चरण : पिता को अरिष्ट तीसरा चरण : शुभ फलदायक चौथा चरण : विद्या और धन के लिए शुभ होता है।
ज्येष्ठा नक्षत्र : मंगल की राशि (वृश्चिक) बुध के इस नक्षत्र में पैदा हुये जातक क्रोधी, सरल हृदय, अध्ययनशील, स्पष्टवादी, तर्कशील, वाकयुद्ध में प्रवीण, धार्मिक, सहयोगी व अहंकारी होते हैं।
ज्येष्ठा प्रथम चरण : बड़े भाई को अरिष्ट दूसरा चरण : छोटे भाई को अरिष्ट तीसरा चरण : माता या नानी को अरिष्ट चौथा चरण : जातक स्वयं को अनिष्टकारी
मूल नक्षत्र : केतु के नक्षत्र और गुरु की राशि धनु में पैदा जातक धार्मिक, उदार हृदय, धनी, ईमानदार, मिलनसार, परोपकारी, नीतिवान, सामाजिक कार्यों में व्यस्त और अच्छे संस्कारों से युक्त होते हैं। सामान्यतया समस्त मूल नक्षत्र को अरिष्ट कारक माना गया है। मूल नक्षत्र में पैदा हुये जातक का शुरू एवं अंत की घड़ियों में विद्वान आचार्यों में मतांतर पाया जाता है।
मूल प्रथम चरण - पिता का नाश दूसरा चरण - माता का नाश तीसरा चरण - धन का नाश चौथा चरण - जातक सुखी, धनी मूल नक्षत्र के संबंध में अनेक मत प्रचलित हैं।
गंडमूल नक्षत्र की शांति कैसे करे -
वापस उसी नक्षत्र के आने पर 27 दिन बाद की जानी चाहिए या जब भी गंडमूल नक्षत्र अश्विनी ,अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा ,मूला, रेवती हो उसी दिन इसकी शांति करानी चाहिए.
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