धन संग्रह करने के लिए शास्त्रानुसार पूर्व पांच ऋण- देव ऋण, पितृ ऋण, ऋषि ऋण, भूत-ऋण एवं मनुष्य ऋण से मुक्ति अति आवश्यक है ,
व्यक्ति यदि अपने पहले मूल कर्ज से निवृत्ति का उपाय नहीं करता है, तो उसे इस जीवन में अर्थ, उपकार, दया के रूप में किसी भी तरह का उधार लेना ही पड़ता है। और पहले उधार को उतारने के पश्चात ही लक्ष्मी को प्राप्त कर सकता है।
लेकिन उपरोक्त पांच ऋण- देव ऋण, पितृ ऋण, ऋषि ऋण, भूत-ऋण एवं मनुष्य ऋण में से किसी भी ऋण का उपाय नहीं किया जाए तो धनवान होने की संभावना निर्मूल है। यदि अध्ययन-अध्यापन करें तो ब्रह्मयज्ञ होने से ऋषि ऋण से मुक्ति मिलती है। हवन-पूजन करने से देवयज्ञ होने पर देव ऋण पूर्ण होता है। श्राद्ध-तर्पण-पूर्वजों के निमित्त, दानादि कर्म से पितृ ऋण उतर जाता है और बलिवैश्व देव एवं पंचबलि करने से भूत ऋण चुक जाता है। मनुष्य ऋण अतिथि सत्कार-मानव सेवा से समाप्त होता है।
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