लक्ष्मीवान होने के लिए ऋणों से मुक्ति प्रथम सीढ़ी है। शास्त्रानुसार व्यक्ति यदि अपने मूल कर्ज से निवृत्ति का उपाय नहीं करता है, तो उसे इस जीवन में अर्थ, उपकार, दया के रूप में किसी भी तरह का उधार लेना ही पड़ता है। इस उधार को उतारने के पश्चात ही मनुष्य लक्ष्मी को प्राप्त कर सकता है।
लेकिन पांच ऋण- देव ऋण, पितृ ऋण, ऋषि ऋण, भूत-ऋण एवं मनुष्य ऋण में से किसी भी ऋण का उपाय नहीं किया जाए तो धनवान होने की संभावना निर्मूल है। यदि अध्ययन-अध्यापन करें तो ब्रह्मयज्ञ होने से ऋषि ऋण से मुक्ति मिलती है। हवन-पूजन करने से देवयज्ञ होने पर देव ऋण पूर्ण होता है। श्राद्ध-तर्पण-पूर्वजों के निमित्त दानादि कर्म से पितृ ऋण उतर जाता है। बलिवैश्व देव एवं पंचबलि करने से भूत ऋण चुक जाता है। अतिथि सत्कार-मानव सेवा से मनुष्य ऋण समाप्त होता है।
इन कर्जों से निवृत्ति मिलने पर हमें भौतिक कर्ज की आवश्यकता नहीं होती है। इस कर्म के पूर्ण होने पर गृहस्थ के यहाँ लक्ष्मी निवास करती है। 'या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः।' इस शास्त्र वाक्य से घर में समृद्धि का स्वयं निवास रहता है। लक्ष्मी से व्यक्ति सुरक्षित, सुसंपन्न, आश्रय देने वाला होकर इस जीवन को सुगमता से पार कर लेता है। अतः दरिद्रता-ऋण से मुक्ति के लिए पुण्यों का संचय करना आवश्यक है।
रूप चतुर्दशी के दिन पवित्रता से पांच प्रकार के पुष्पों की माला में दूर्वा व बिल्वपत्र लगाकर देवी को अर्पित करें। माल्यार्पण करते समय मौन रखें। यह प्रयोग प्रभावकारी होकर यश की वृद्धि करता है।
अन्नकूट के दिन भोजन बनाकर देवता के निमित्त मंदिर में, पितरों के निमित्त गाय को, क्षेत्रपाल के निमित्त कुत्ते को, ऋषियों के निमित्त ब्राह्मण को, कुलदेव के निमित्त पक्षी को, भूतादि के निमित्त भिखारी को दें। साथ में वृक्ष को जल अर्पित करें, सूर्य को अर्घ्य दें, अग्नि में घी अर्पित करें, चींटियों को आटा तथा मछली को आटे की गोली देने से घर में बरकत आती है।
भाईदूज के दिन प्रातः शुद्ध पवित्र होकर रेशमी धागा गुरु व ईष्ट देव का स्मरण करके धूप दीप के बाद उनके दाहिने हाथ में यह डोरा बांधें। डोरा बांधते समय ईश्वर का स्मरण करते रहें। यह प्रयोग वर्षपर्यंत सुरक्षा देता है। सूर्य षष्ठी के दिन सायंकाल तांबे के लोटे में कुमकुम, केसर, लाल फूल डालकर सूर्य की ओर मुंह करके जल दें। जल देकर वहीं सात बार घूमें। यह तेज प्रदायक प्रयोग है। अक्षय नवमी के दिन इक्कीस आंवले, एक नारियल देवता के सामने रखकर श्रद्धा-भक्ति से प्रणाम करना चाहिए। चढ़े हुए आंवले व नारियल के साथ कपड़ा व मुद्रा रखकर बहन व ब्राह्मण को दे दें। यह दान आपके पुण्यों को अक्षय प्रदान करता है।
देव प्रबोधनी एकादशी को छोटी दिवाली भी कहा जाता है। देवता के जागने के इस दिन से शुभ काम की शुरुआत होती है। संस्कारादि कार्यों की प्रारंभता के लिए श्रेष्ठ दिन में आप सिंदूर व गाय के घी या शुद्ध घी मिलाकर अनार की लकड़ी से निम्न यंत्र घर में किसी भी पवित्र स्थान पर पूर्व या उत्तर की दीवार पर लिखें। यदि दीवार पर स्थान नहीं मिलें तो किसी चोकोर अखंडित पत्थर पर भी यह यंत्र बना सकते हैं।
विशेष परिस्थिति में बिना लाइन वाले सफेद कागज पर भी बनाकर पूर्व या उत्तर की ओर रख सकते हैं। इस यंत्र को लिखकर उस पर पुष्प, अक्षत, धूप, दीप व नेवैद्य से पूजना चाहिए। फिर उसके सामने 108 बार 'ॐ दू दुर्गायैः नमः' मंत्र का जप करना चाहिए, ऐसा करने से घर में समृद्धि आती है।
सभी प्रकार की बाधा का शमन होता है। यंत्र में अंक हिन्दी वर्णमाला के लिखें। यंत्र बाएं से दाएं ओर की तथा नीचे से ऊपर करके लिखें।
सोजन्य वेबदुनिया
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